Thursday, July 11, 2024
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ऑटो इम्यून बीमारी ने खेल प्रेमी युवा का बदल दिया जीवन

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नई दिल्ली : ऑटो इम्यून बीमारियां autoimmune disease वह अनबुझ पहली है, जिसे सुलझाना तो दूर हम यह भी जानने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं कि आखिरकार इसके पीछे जिम्मेदार वजह क्या है। हालांकि, दुनियाभर में इसके मूल कारण और निवारण का पता लगाने के लिए अनेक प्रकार के शोध और अध्ययन किए जा रहे हैं। इस बीमारी का मानव जीवन पर ऐसा प्रभाव पडता है कि जीवन हर क्षण एक संघर्ष बन जाता है। कुछ इस चुनौती को स्वीकार करते हैं और कुछ हालातों से समझौता कर लेेते हैं।


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कमाल की बात यह है​ कि जीते जी जीवन को नर्क बना देने वाली ऐसी autoimmune disease बीमारियों को लेकर सामाजिक स्तर पर जागरूकता की बेहद कमी है। जब भी ऐसी बीमारियों की बात सामने आती है, तो अच्छे खासे पढे -लिखे लोग आसमान की ओर ताकने के लिए मजबूर हो जाते हैं, सोचते हैं क्या ऐसी भी कोई बीमारी होती है क्या…कुलमिलाकर हमारा समाज जानलेवा बीमारियों को लेकर तो बेहद जागरूक है लेकिन जीते जी जिंदगी को बेजार करने वाली बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता कम है। दुनिया भर के ऑटो इम्यून पीडित लोग सिर्फ रोग प्रबंधन के भरोसे हैं और मन में सिर्फ एक ही सवाल है, आखिर कब मिलेगा इसका प्रभावी उपचार।

कॉनर फैरो एक खुशमिजाज और सक्रिय किशोर हैं, जो अपने खेल से प्यार करते है। विशेष रूप से रग्बी इनका प्रिय खेल है। गुरूवार दोपहर वे रग्बी खेल रहे थे लेकिन अब वह वेलिंगटन अस्पताल के आईसीयू वार्ड में कोमा की स्थिति में हैं और एक ऑटोइम्यून बीमारी सेेे संघर्ष कर रहे हैं। चंद घंटों पहले ही उनकी जिंदगी खुशहाल थी लेकिन अब जिंदगी बेेहाल है। परिजन बेबस होकर सिर्फ डॉक्टर की तरफ देखने को मजबूर हैं, किसी के हाथ में कुछ नहीं हैं।

दुआओं का दौर जारी है और सहायता के लिए आवाज लगाई जा रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यहां यह है​ कि कॉनर फैरी जिस बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके परिवार ने कभी उसका नाम तक नहीं सुना था। अब सामने मुसीबत आई तो यह तय करना जरा कठिन हो रहा था कि आखिर उपचार के लिए कहां जाएं और क्या करें। जाहिर है इस जद्दोजहद की स्थिति में भी उनका काफी समय बर्बाद हुआ होगा। अब इन बीमारियों को लेकर जागरूकता की बानगी का पता यहीं से चलता है कि अगर परिवार ऐसी बीमारियों के प्रति जागरूक होता तो शायद उपचार की प्रक्रिया जल्दी शुरू हो सकती थी।

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कॉनर फैरो के परिजनों को डॉक्टर ने बताया कि वह गुइलेन बैरी सिंड्रोम (GBS) से पीडित हैं। यह एक दुर्लभ श्रेणी की बीमारी है। जो किशोरों को अपनी चपेट में लेती है। उनकी मां रेबेका फैरो को उम्मीद है कि अपने परिवार की कहानी को साझा करने से स्थिति और इसके विनाशकारी प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद मिलेगी। समस्या से जूझने के बाद परिजन इस मामले में जागरूकता के महत्व को मान रहे हैं।

दरअसल, एक हफ्ते पहले कॉनोर, थोड़ा अस्वस्थ महसूस कर रहा था और कुछ दिनों से स्कूल भी नहीं जा रहा था। वह गुरुवार को उसे लगा कि रग्बी खेलकर शायद उसकी तबियत में सुधार आएगा। अगले दिन उसे माइग्रेन की समस्या हुई। हफ्ते के अंत तक जाकर माइग्रेन की स्थिति बदतर होती चली गई। रविवार रात तक कॉनर कमजोर महसूस करने लगा। स्थिति बिगडता हुआ देखकर परिजनों ने कॉनोर को वेलिंगटन अस्पताल में भर्ती करवाया। जहां प्राथमिक परीक्षण में इन्फ्लूएंजा से प्रभावित होने की बात सामने आई। फ्लू के लक्षणों ने कई परीक्षणों के साथ डायग्नॉसिस की प्रक्रिया को और अधिक कठिन बना दिया। कॉनोर का रक्त परीक्षण, एमआरआई स्कैन और एक स्पाइनल टैप की जांच की गई।

सभी जांच के नतीजे सामान्य पाए गए लेकिन इस बीच उनकी हालत और बिगडती चली गई। यहां हैरान करने वाली बात यह है कि बीते गुरुवार यानि, 23 जून तक किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी कि उन्हें कोई ऐसी ऑटोइम्यून बीमारी है, जो उन्हें कोमा की स्थिति तक पहुंचा देगी। काफी समय जांच में लगने के बाद आखिरकार न्यूरोलॉजिस्ट ने उनके परिजनों को यह जानकारी दी कि वह जीबीएस से पीडित हैं। तब तक कॉनोर के पैरों में “पिन और सुइयों” के चुभने जैसी फिलिंग उनके शरीर के बांकी हिस्सों में भी फैल गई थी। अब वह सांस लेने तक के लिए संघर्ष कर रहा है। इन सबसे राहत के लिए उन्हें इंड्यूस्ट कोमा की स्थि​ति में रखा गया है।

डॉक्टर ने परिजनों को बताया कि जीबीएस पैरों से शुरू होता है और शरीर के ऊपरी हिससे स्ट्रोक से पीडित हो जाते हैं। ऐसे में मरीज के लिए खुद अपने दम पर सांस तक लेना मुशिकल हो जाता है। वास्तव में कॉनर जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है और उसके परिजन खुद को बेहद डरावनी स्थिति में धिरता हुआ महसूस कर रहे हैं।

आखिर क्या है गुइलेन-बैरे सिंड्रोम?

यह एक न्यूरोलॉजिकल विकार है। जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर की न्यूरोलॉजिकल सिस्टम पर हमला कर देती है और नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है। इससे पक्षाघात होता है।
ओटागो यूनिवर्सिटी के वेलिंगटन कैंपस में क्लिनिकल सीनियर लेक्चरर और गुइलेन-बैरे सिंड्रोम सपोर्ट ग्रुप एनजेड के मेडिकल एडवाइजरी बोर्ड के प्रमुख डॉ. गैरेथ पैरी (ONZM) ने कहा कि हर साल न्यूजीलैंड में लगभग 120 नए मामलों के साथ, यह एक “दुर्लभ बीमारी” सामने आती है।

यह क्यों होता है इसका कारण “थोड़ा अस्पष्ट” है, लेकिन अक्सर आणविक मिमिक्री के रूप में जानी जाने वाली एक घटना को इसके पीछे जिम्मेदार माना जाता है। इस केस में बीमारियों की दुर्लभता और इसके बारे में जागरूकता की कमी के कारण इसका समय रहते पता नहीं लग पाया था और स्थिति इस कदर गंभीर होती चली गई।
जीबीएस से पीडित लगभग 40% लोगों को उपचार की आवश्यकता होती है। गंभीर मामलों में इसमें intravenous infusion of immunoglobulin की आवश्यकता पडती है। लोगों का प्लाज्मा एक्सचेंज के माध्यम से भी इलाज किया जा सकता है। जहां रक्त को शरीर से बाहर ले जाया जाता है, हानिकारक एंटीबॉडी को रक्त से हटा दिया जाता है, और फिर रक्त वापिस शरीर में डाल दिया जाता है।

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पैरी के मुताबिक जीबीएस वाले अधिकांश लोग आमतौर पर संक्रमित होने के बाद दो से चार सप्ताह के बीच उबरना शुरू कर देते हैं। उन्होंने कहा कि कॉनर तेजी से और बेहतर उबरने की स्थिति में आ गए। उन्हें पूरी तरह सामान्य होने में लगभग 6 से 12 महीनोें का वक्त लग सकता है। इस दौरान न्यूरोलॉजिकल नुकसान और थकान के कारण कुछ चुनौतियों का भी सामना करना पड सकता है। पैरी के मुताबिक लोगों के लिए पहले सात दिनों के भीतर इलाज कराना महत्वपूर्ण होता है। खासकर जब चलने के लिए भी संघर्ष करने की स्थिति में मरीज पहुंच जाए तो उपचार शीघ्र शुरू कियाय जाना चाहिए। अगर समय रहते इस बीमारी का उपचार शुरू कर दिया जाए तो उपचार प्रक्रिया बेहद प्रभावी साबित होती है। कॉनर को दो बार intravenous infusion of immunoglobulin ले चुके हैं। अब उनके परिजन यह देखने के लिए इंतजार कर रहे हैं कि आगे उनकी हालत में किस तरह सुधार आता है।

कॉनर की मां रेबेका फैरो के मुताबिक हमारी मुश्किल स्थिति में जिन लोगों ने हमारी मदद की उनके लिए वे आभारी हैं। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान परिवार के लिए स्थापित एक givealittle पेज ने $18,000 से अधिक रकम जुटाए थे। कॉनोर की उपचार के लिए जुटाई गई इस रकम से परिजनों को काफी राहत मिली है।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

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