Saturday, July 13, 2024
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AS से लंबे समय तक जूझती रही डॉक्टर, 10 साल बाद हुआ निदान 

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  •  भरोसा नहीं कर पा रहीं थी कि उन्हें भी हो सकती है यह बीमारी

AS से लंबे समय तक जूझती रही डॉक्टर, 10 साल बाद हुआ निदान 
AS से लंबे समय तक जूझती रही डॉक्टर, 10 साल बाद हुआ निदान
नई दिल्ली।टीम डिजिटल :
Ankylosing Spondylitis (AS) को अगर गुप्त शत्रु का नाम दें तो यह गलत नहीं होगा। हम इसे रहस्यों से भरी बीमारी भी कहें तो यह भी शायद गलत नहीं होगा। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्यों कि वर्षों तक शरीर के अंदर मौजूद रहने के बाद भी यह अपनी उपस्थिति नहीं जताता लेकिन जब यह सक्रिय होता है तो फिर इस बीमारी के असली रंग सामने आते हैं। 

अमेरिका में रहने वाली एक डॉक्टर के साथ जो घटित हुआ, उसके बाद इस बीमारी को आप गुप्त शत्रु या रहस्मयी कहें दोनों ही विशेषण सही प्रतीत होता है। यह कहानी एक ऐसे डॉक्टर (Ankylosing spondylitis patient story) की है, जिन्हें खुद के शरीर में AS की मौजूदगी का अहसास या यूं कहिए कि इसका निदान करने में 10 वर्ष से भी अधिक समय लग गया। केवल इतना ही नहीं लक्षणों के आधार पर उन्हें खुद के क्रॉनिक इंफ्लेमेशन जैसी किसी बीमारी से पीडित (life with ankylosing spondylitis) होने का अंदेशा तो होता था लेकिन वह इसे स्वीकार नहीं कर पाती थी। उन्हें यह लगता था कि उनके जैसी सक्रिय दिनचर्या वाले इंसान को ऐसी कोई बीमारी हो ही नहीं सकती। 
 सांता फ़े, एनएम की एम.डी. हिलेरी नॉर्टन अब AS से मिले अपने तमाम तजुर्बे को इससे पीडित मरीजों को राहत देने में इस्तेमाल करती हैं। नॉर्टन ने अपने एक स्थानीय मीडिया से बातचीत में अपनी आपबीती को विस्तार से साझा किया है। नॉर्टन के मुताबिक जब वह अपने 20 वें से 21वें वर्ष में प्रवेश करने वाली थी और प्री-मेड कोर्स की तैयारी कर रही थी, तभी उन्हें यह अहसास होने लगा था कि उनके साथ कुछ सही नहीं हो रहा है। 

नॉर्टन को अहसास होने लगा था कि कुछ गलत हो रहा है :

AS से लंबे समय तक जूझती रही डॉक्टर, 10 साल बाद हुआ निदान 
AS से लंबे समय तक जूझती रही डॉक्टर, 10 साल बाद हुआ निदान
शुरूआती चरणों में दर्द उभरता था और फिर कुछ अंतराल के बाद खुद ही ठीक भी हो जाता था। जब वह इधर-उधर मूवमेंट करती थी, तो दर्द दूर होने लगता था। रात को अक्सर वह पीठ दर्द का अहसास करती थी और उन्हें इस वजह से नींद नहीं आती थी। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर यह जान लिया था कि मूवमेंट करने से उन्हें दर्द से राहत मिलेगी लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनके लिए यह विकल्प भी कठिन होता चला गया।

समय के साथ लक्षण होने लगे गंभीर :

 उन्हें अब चलने में भी कठिनाई होने लगी थी। नॉर्टन के मुताबिक यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता रहा। पहले तो दर्द कुछ अंतराल पर होता था लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढती गई, दर्द भी नियमित होती चली गई। नॉर्टन बताती है कि एक समय ऐसा आया कि जब बिस्तर पर आराम करने की क्षमता भी सीमित होने लगी। पहले वह आराम से सुबह के 4-5 बजे तक सोती थी। अब उनकी इस दिनचर्या में अचानक से बदलाव आने लगा था। उनकी नींद अब सुबह के 3 बजे ही खुलनी शुरू हो गई। फिर सोने के घंटे और कम होने लगे और वह अब आधी रात को 2 बजे ही नींद से जग जाती थी। धीरे-धीरे समस्या बढती चली गई और अब नॉर्टन मुश्किल से दो घंटे ही सो पाती थी। नॉर्टन के मुताबिक यह स्थिति उनके लिए बेहद असहज साबित हो रही थी। हालात यह हो गए कि उन्हें एक से दूसरी तरफ करवट बदलने में कई बार 15 मिनट तक का समय लग जाता था। 

[fvplayer id=”2″]इंटरनेट पर ढूंढती थी अपनी बीमारी :

नॉर्टन के मुताबिक इन परेशानियों से जूझते हुए वह किसी बीमारी की संभावित मरीज की तरह यह जानने को बेचैन हो गई थी कि आखिरकार उन्हें ऐसा क्या हो गया है। उन्होंने पता लगाने के लिए इंटरनेट पर रिसर्च करना शुरू कर दिया। अपने लक्षणों के आधार पर नॉर्टन कई बार किसी क्रॉनिक इंफ्लेमेंशन से पीडित होने के नतीजों तक पहुंचती थी लेकिन फिर जानकारी के उस हिस्से को यह मानकर नजरअंदाज कर देती थी कि उनके जैसे युवा, सक्रिय व्यक्ति को इस तरह की बीमारी हो ही नहीं सकती है। वह सोचती थी कि वह एक युवा हैं और स्वस्थ्य हैं, जिसे पीठ में दर्द की सामान्य समस्या है। 

नहीं हो सका सही निदान :

नॉर्टन के मुताबिक उन्होंने एक स्पोर्ट्स-मेडिसिन विशेषज्ञ से यह सोचकर परामर्श लेने का मन बनाया कि उन्हें एथलेटिक गतिविधियों से संबंधित कुछ समस्या हुई है जो ट्रेल रनिंग, माउंटेन बाइक की सवारी और तैराकी की वजह से हो सकती है लेकिन यहां उनके साथ वहीं हुआ जो ज्यादातर AS के मरीजों के साथ होता है। उनके रोग का गलत निदान किया गया। चिकित्सक ने आशंका जताई कि उनके पीठ में अत्यधिक तनाव की वजह से समस्या हुई है। चिकित्सक ने उन्हें फिजियोथेरेपिस्ट के पास भेज दिया।  

फिजियोथेरेपी से भी नहीं मिली राहत :

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भौतिक चिकित्सक (पीटी) के कई हफ्तों के प्रयासों के बाद भी उन्हें किसी तरह की राहत नहीं मिली। नॉर्टन के मुताबिक मेडिकल स्कूल में रहते हुए यह सब करना काफी मुश्किल भी हो रहा था। इसके बाद भी उन्हें दोबारा पीटी के पास भेजा गया। डॉक्टर ने उनकी बीमारी का निदान करने का दावा करते हुए यह कहा कि वेट लिफ्टिंग के कारण बैक में इंजरी होने से दर्द की समस्या हुई है। अब नॉर्टन को यह अहसास होने लगा था कि उन्हें AS है। बावजूद इसके उन्होंने पीटी के साथ कई सत्र किए। नॉर्टन के मुताबिक वह जीवन के साथ आगे बढने की कोशिश कर रही थी। 

आंखों में अचानक उभरी यूवेइटिस :

नॉर्टन बताती हैं कि न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय में 1 जुलाई 2007 में 30 घंटों के तनाव भरे शिफ्ट के दौरान ही उनकी बाईं आंख में सूजन विकसित हो गया। बाहर निकलने और रोशनी पडते ही वह असहनीय पीडा का अहसास कर रही थी। उनके सुपरवाइजर रेजिडेंट ने आशंका जताई कि उन्हें यूवेइटिस हो सकता है। आंख के आगे जब सूजन बढा तो इमरजेंसी के आधार पर तत्काल उन्हें नेत्र विशेषज्ञ से दिखाया गया। डॉक्टर ने नॉर्टन की जांच की और पूछा कि क्या उन्हें कभी कमर दर्द हुआ है। नॉर्टन ने कहा कि वे करीब 10 वर्षों से भयानक कमर दर्द से जूझ रही हैं। नॉर्टन कहती हैं कि उन्हें अभी भी यकीन नहीं था कि AS और उनकी आंख की समस्या के बीच किसी तरह का कोई कनेक्शन है। आखिरकार उस नेत्र विशेषज्ञ ने उनसे कहा कि आप को रुमेटोलॉजिस्ट से परामर्श लेनी चाहिए। 

नेत्र विशेषज्ञ ने किया रूमेटोलॉजिस्ट के पास रेफर :

नॉर्टन के मुताबिक जब उन्होंने रुमेटोलॉजिस्ट को दिखाया तो उन्होंने कई तरह के सवाल किए। उन्होंने नॉर्टन से उनका पारिवारिक इतिहास और पहले हो चुके जांच के बारे में जानकारी ली। प्राथमिक स्तर पर विशेषज्ञ ने उनका शारीरिक परीक्षण किया और फिर एक्स-रे कराने के लिए कहा। साथ ही उन्होंने ब्लड टेस्ट कराने की भी सलाह दी। नॉर्टन का जब ब्ल्ड टेस्ट रिपोर्ट आया तो पता चला कि उनका एचएलए-बी27, जेनेटिक मार्कर टेस्ट पॉजिटिव है और यह एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस के लिए एक जोखिम कारक के रूप में जाना जाता है। 

रूमेटोलॉजिस्ट ने बताया HLAB27 का रहस्य :

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नॉर्टन के मुताबिक उनके रूमेटोजॉजिस्ट ने उन्हें कुछ इसतरह से एचएलए-बी27 के बारे में बताया, “कुछ लोगों में यह जीन होने के बावजूद इससे जुड़ी कोई बीमारी उन्हें प्रभावित नहीं करती। जब यह जीन अच्छी तरह से काम करता है, तो यह शरीर को सफेद रक्त कोशिका सतहों पर एक प्रोटीन बनाने का निर्देश देता है, जो शरीर की अपनी कोशिकाओं और बाहरी आक्रमणकारियों के बीच अंतर करने में मदद करता है-जैसे संक्रमण लेकिन जब यही जीन भ्रमित हो जाता है तो अपने ही शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर हमलावर होने के संकेत जारी करने लगता है। 

खास जांच विधि नहीं होने के कारण बीमारी का निदान करना है जटिल :

विशेषज्ञ ने उन्हें आगे कहा कि “यह भी संभव है कि आपके शरीर में इस जीन की मौजूदगी हो लेकिन आप AS से पीडित न हों। जबकि, एएस के 90% से अधिक रोगियों में इस जीन की सकारात्मक रूप से मौजूदगी पाई जाती है। इस मार्कर का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति के रोग निदान के लिए किया जाता है जो पीठ या कमर दर्द  की समस्या से पीडित हो। उन्होंने कहा कि यह भी हो सकता है कि शरीर में इस जीन की जांच सकारात्मक न हो फिर भी व्यक्ति AS से पीडित हो। विशेषज्ञ ने आखिरी निष्कर्श के तौर पर कहा कि AS के लिए कोई खास जांच विधि नहीं है। यही कारण है कि इसका निदान करना जटिल है। 

नॉर्टन को अहसास हुआ लक्षणों को नजरअंदाज करने से हुई निदान में देरी :

नॉर्टन के मुताबिक उन्होंने सालों तक जिस बात को नजरअंदाज किया अंत में वहीं आशंका आज सच बनकर सामने आ खडी हुई और यही प्रवृत्ति उनके निदान और उपचार में देरी का कारण साबित हुई। नॉर्टन इंटरनल मेडिसिन में रेजीडेंसी कर रही थी। फिर उन्होंने रयूमेटोलॉजी में फेलोशिप किया। इस दौरान वह असहनीय पीडा और नींद की कमी से जूझती रहीं। साथ ही वह व्यायाम और योग की मदद से खुद को ठीक रखने की कोशिश भी कर रही थी। 

[fvplayer id=”3″]आखिरकार डॉक्टर ने बॉयोलॉजिक्स लेने की सलाह दी : 

अंत में उन्हें विशेषज्ञ ने बायोलॉजिक्स शुरू करने की सलाह दी। बायोलॉजिक्स लेने के बाद नॉर्टन ने कहा कि अगर उन्हें यह पता होता कि बॉयोलॉजिक्स लेने के बाद उनकी जिंदगी इस कदर आसान हो जाएगी तो वह और पहले ही इसे शुरू कर देती। उन्होंन एक टीएनएफ अवरोधक लिया। उस समय बॉयोलॉजिस्क के तौर पर यही एक मात्र तात्कालिक विकल्प के तौर पर उपलब्ध था।

गेम चेंजर साबित हुआ बायोलॉजिक्स :

नॉर्टन के मुताबिक वह भाग्यशाली थी कि उन्हें बॉयोलॉजिस्क से बेहतर प्रतिक्रिया और राहत मिली। उनके लिए यह समय की रफ्तार को वापस मोडने जैसा था। वह तबतक सोती रहीं, जबतक सूरज नहीं निकल गया और कई वर्षों के बाद ऐसा हुआ कि वह अपनी नींद पूरी कर बिस्तर से उठीं। नॉर्टन कहती हैं कि यह सुनने में थोडा अजीब लगता है लेकिन उन्हें ऐसा लगा कि उनके शरीर से कोई भूत निकल गया है। बॉयोलॉजिस्क के बारे में नॉर्टन कहती है कि इस दवा ने उन्हें वापस वह सबकुछ दे दिया, जो पिछले कई वर्षों से उनसे AS ने छीन लिया था। 

लोगों को उम्मीद ही नहीं होती है कि हो सकती है काई ऐसी बीमारी :

नॉर्टन से जब यह सवाल पूछा गया कि आखिरकार इस रोग के निदान में इतना समय क्यों लगता है और इस मामले में उनका अनुभव क्या कहता है? इसपर नॉर्टन ने कहा कि इस बीमारी के निदान में औसत समय 7 से 10 वर्ष लग ही जाता है। उन्होंने कहा कि यह एक अदृश्य बीमारी है और इसका प्राथमिक लक्षण पीठ दर्द है। अधिकांश लोगों को अपने जीवन में कभी न कभी पीठ में दर्द होता है, यह बीमारी कम उम्र में आती है – आमतौर पर 20 वर्ष की उम्र के आसपास और शुरू में बहुत से रोगी इस समस्या और उसके निदान को लेकर गंभीर नहीं होते हैं। वह भी ऐसे लोगों में से एक थी।

आम पीठ दर्द समझने की भूल करते हैं लोग :

 ज्यादातर लोगोें को यही लगता है कि व्यायाम या सपोर्टस एक्टिविटी के दौरान कुछ गलत होने की वजह से उन्हें समस्या हुई है। नॉर्टन ने आगे कहा कि मेरी तरह लोग पहले किसी स्पोर्टस इंजरी या सामान्य चिकित्सक से ही उपचार के लिए सोचते हैं। कोई यह सोच भी नहीं पाता कि इतनी कम उम्र में उन्हें कोई क्रॉनिक इंफ्लामेट्री बीमारी भी चपेट में ले सकती है। नॉर्टन के मुताबिक अक्सर पहली लाइन के विशेषज्ञ AS की पहचान को लेकर भ्रमित हो जाते हैं, इसका नकारात्मक पहलू यह है कि रूमेटोलॅाजिस्ट के पास रेफर करने में देरी होती है। 

खुद के अनुभव से करती हैं मरीजों का निदान :

AS से लंबे समय तक जूझती रही डॉक्टर, 10 साल बाद हुआ निदान 
AS से लंबे समय तक जूझती रही डॉक्टर, 10 साल बाद हुआ निदान
नॉर्टन के मुताबिक वह अब पीठ या कमर दर्द वाले मरीजोें की बारीकी से जांच करती हैं ताकि आशंका गहरी होने पर उन्हें समय से रूमेटोलॉजिस्ट के पास भेजा जा सके। वे इस मामले में लोगों के बीच जागरूकता बढाने की कोशिश में जुटी हुई हैं। नॉर्टन के मुताबिक AS के प्रति लोगों में जानकारी का अभाव और चिकित्सकीय स्तर पर व्याप्त उदासीनता ने उन्हें इसके प्रति जागरूकता फैलाने के लिए उन्हें प्रेरित किया। अब वह बाकायदा अपने मिशन में जुटी भी हुई हैं। नॉर्टन कहती हैंं कि “मुझे लगता है कि मेरे पास एक अनूठा दृष्टिकोण और वास्तव में यह समझने की क्षमता है कि इससे पीडित रोगी की सोच क्या होगी”। अपनी बीमारी के साथ प्राप्त किए अनुभवों के आधार पर नॉर्टन ने कहा कि “इस बीमारी को वास्तव में कितना गलत समझा गया है। इस बीमारी में ऐसा कुछ है कि आप इसे किताबी ज्ञान के भरोसे नहीं छोड सकते।

एक जैसी नहीं होती है सभी मरीजों की स्थिति :

उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि उपचार स्वीकार करने से पहले हम सभी के पास अलग-अलग विकल्प होते हैं। जैसे कि हम हम किन लक्षणों का सामना करते हुए जी रहे हैं। मुझे अब इस बात का अहसास हो रहा है कि इलाज के बिना मेरी बीमारी, मेरे जीवन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर देती और इसकी 100% संभावना थी। जिस हद तक मेरा करियर खतरे में था, इससे पहले कि मैं इसे स्वीकार करने को तैयार होती, इसके लक्षणों ने मुझे बुरी तरह प्रभावित कर दिया। मुझे चलने में दिक्कत हो रही थी। मैं सीढ़ियों से ऊपर और नीचे नहीं जा सकती थी और मुझे लिफ्ट का सहारा लेना पड रहा था। मुझे लगने लगा था कि मेरा आगे का समय व्हीलचेयर पर ही बीतने वाला है। 

मरीज बनाए रखें अपना आत्मविश्वास :

नॉर्टन ने AS के उन मरीजों के लिए तीन महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं, जिनका निदान अभी हाल ही में हुआ है। नॉर्टन के मुताबिक मरीज को कभी खुद पर अकेलापन हावी नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह अदृस्य बीमारी मरीजों के करीबी लोगों के समझ से बाहर है। साथ रहने वाले परिजनों यह नहीं समझ पाते हैं कि मरीज किस दौर से गुजर रहा है। दिन के दौरान मूवमेंट करता हुआ मरीज सामान्य दिख सकता है लेकिन रात को लोग उसी शख्स को दर्द से कराहते हुए देखकर हैरान होते हैं। नॉर्टन के मुताबिक मरीज को खुद के प्रति काइंड रहने की जरूरत है। कुछ ऐसे उपाए हैं जिसे मरीज अपनी जीवनशैली में सकारात्मक रूप से शामिल कर सकते हैं। जैसे : नींद का प्रबंधन, नियमित और अनुशासित दिनचर्या का पालन, नियमित व्यायाम, स्वस्थ और पौष्टिक आहार, धुम्रपान और शराब से दूरी बनाना। 

एहतिहात बरतने के बाद भी कई बार लक्षण हो सकते हैं बेकाबू :

नॉर्टन के मुताबिक यह भी एक सच्चाई है ​कि इतना सबकुछ करते रहने के बाद भी कई बार इस बीमारी को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके मरीज को आशावादी और सकारात्मक बने रहना चाहिए। नॉर्टन के मुताबिक वर्तमान में उपचार के बेहतर विकल्प हैं और अभी आगे और भी बहुत कुछ आने वाला है।  वह अपने कार्यालय में क्लिनिकल परीक्षण करती हैं,। बायोलॉजिक्स और कई अन्य उपचार विकल्प अभी पाइपलाइन में हैं। आगे उपचार के जो नए विकल्प आएंगे वह पहले से कहीं ज्यादा राहत देने वाले साबित होंगे। छोटे अणु रूमेटाइड गठिया में उपयोग की जाने वाली दवाओं का एक नया वर्ग है। वे मौखिक दवाएं हैं, और कम आणविक भार वाले होते हैं और कोशिका में प्रवेश कर सकते हैं और वे जीन प्रतिलेखन को प्रभावित कर सकते हैं। 

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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

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