Monday, April 22, 2024
HomeLatest ResearchAutoimmune Diseases : इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों के उपयोग से बढ सकता है फ्रैक्चर...

Autoimmune Diseases : इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों के उपयोग से बढ सकता है फ्रैक्चर का खतरा 

Join Whatsapp Channel Join Now
Join Telegram Group Join Now
Follow Google News Join Now

नए अध्ययन में विशेषज्ञों ने किया खुलासा

Autoimmune Diseases : ऑटोइम्यून बीमारियों के मरीजों में इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों (immunosuppressive agents) के उपयोग से फ्रैक्चर यानि ऑस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) का खतरा बढता है। यह खुलासा ताइवान के विशेषज्ञों ने अपने ताजा अध्ययन के हवाले से किया है।
कई अध्ययनों में ऑटोइम्यून बीमारियों (Autoimmune Diseases) वाले मरीजों में इम्यूनोसप्रसिव एजेंटों (immunosuppressive agents) और फ्रैक्चर जोखिम के संबंध में पहले भी अध्ययन किए गए हैं। इस बीमारी से पीडित मरीजों में इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों और फ्रैक्चर जोखिम के बीच के संबंध के underlying mechanism जटिल हैं।
इसे पूरी तरह से समझना मुश्किल है। हालांकि, ऐसा माना जाता है कि ये दवाएं bone metabolism को प्रभावित कर सकती है और ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को बढा सकती है। ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बोन डेनसिटी (bone density) कम हो जाती है। जिससे हड्डिया कमजोर होकर जरा सा झटका लगते ही टूट सकती है।

Autoimmune Diseases को लेकर क्या कहता है नया अध्ययन 

बायोमेडिसिन (biomedicine) में प्रकाशित एक नए अध्ययन से यह पता चला है कि ऑटोइम्यून बीमारियों वाले मरीजों में इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों के लंबे समय तक उपयोग करने से विशेष रूप से कूल्हे (hip) और इसके आसपास मौजूद हड्डियों में फ्रैक्चर का खतरा बढ सकता है।
इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों का उपयोग बढा सकता है फ्रैक्चर का खतरा
इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों का उपयोग बढा सकता है फ्रैक्चर का खतरा | Photo : canva
शोधकर्ताओं ने ताइवान (taiwan) के राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा अनुसंधान डेटाबेस (National Health Insurance  Research Database) के डेटा का उपयोग करके एक retrospective स्टडी की है। जिसमें वर्ष 2000 से 2014 के बीच सोरियाटिक गठिया (psoriatic arthritis), रूमेटीइड गठिया (rheumatoid arthritis), एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis) और सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (Systemic Lupus Erythematosus) सहित अन्य दूसरे ऑटोइम्यून बीमारियों (Autoimmune Diseases) से पीडित मरीजों को अध्ययन में शामिल किया गया था।
इसी अवधि के दौरान उसी डेटाबेस से ऐसे मरीजों के control group को भी चुना गया, जिन्हें ऑटोइम्यून बीमारी नहीं थी। ऑटोइम्यून बीमारियों वाले मरीजों को इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों के उपयोग के आधार पर दो Sub-Groups में विभाजित कर दिया गया।

चौंकाने वाला साबित हो रहा है अध्ययन का निष्कर्ष 

अध्ययन में यह पाया गया कि ऑटोइम्यून बीमारियों वाले मरीजों में फ्रैक्चर का जोखिम किसी दूसरी बीमारियों के मरीजों की तुलना में 1.14 गुना अधिक है।
इम्यूनोसप्रेसेंट  Sub-Group के मरीजों में  Non-immunosuppressant subgroup के रोगियों की तुलना में फ्रैक्चर का खतरा अधिक था।
इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों का उपयोग बढा सकता है फ्रैक्चर का खतरा
इम्यूनोसप्रेसिव एजेंटों का उपयोग बढा सकता है फ्रैक्चर का खतरा | Photo : Canva
कंधे केक फ्रैक्चर के लिए adjusted substatement risk ratio 1.27 (95%सीआई = 1.01-1.58, स्पाइन फ्रैक्चर के लिए 1.43 (95% सीआई = 1.26-1.62) कलाई के फ्रैक्चर के लिए 0.95 (95% सीआई =0.75-1.22)  और कूल्हे के फ्रैक्चर के लिए 1.67(95% सीआई =1.38-2.03) पाया गया है।
इस अध्ययन के नतीजों का विश्लेषण करने के बाद विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे कि इम्यूनोसप्रेसिव के उपयोग से ऑटोइम्यून बीमारी वाले मरीजों में फ्रैक्चर का जोखिम बढ सकता है। इसका विशेष प्रभाव कूल्हों में देखने को मिल सकता है। अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक इन बीमारियों का उपचार करने वाले चिकित्सकों इस संभावित जोखिम के बारे में पता होना चाहिए।
चिकित्सकों को ऐसे मरीजों को गिरने के खतरे और इससे होने वाले नुकसान को मरीजों को विशेषतौर पर बताना चाहिए। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ऑटोइम्यून बीमारियों में इम्यूनोसप्रेसेंट के उपयोग और फ्रैक्चर को रोकने के लिए optimal strategies को निर्धारित करने के लिए आगे और भी अध्ययन करने की जरूरत है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इम्यूनोसप्रेसेंट के उपयोग के साथ जरूरी एहतिहात भी बरती जाए।

हड्डियों को मजबूत करने वाले आहार लें

इम्यूनोसप्रेसेंट (immunosuppressive agents) का उपयोग करने वाले ऑटोइम्यून बीमारियों से पीडित मरीजों को हड्डियों की मजबूती की दिशा में विशेष ध्यान देना चाहिए। ऐसे मरीजों को विटामिन डी, कैलशियम, विटामिन बी 12 युक्त आहारों को विशेषतौर से सेवन करना चाहिए।
ऐसे मरीजों को समय-समय पर बोन डेनसिटी टेस्ट करवाते रहना चाहिए। अगर रिपोर्ट में किसी तरह की गडबडी सामने आए तो तत्काल अपने रूमेटोलॉजिस्ट से संपर्क करनी चाहिए। ऑटोइम्यून मरीजों को विशेषतौर से गिरने से बचना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले अपने चप्पल और जूतों की ग्रिप का ध्यान रखें। इसके साथ ही बाथरूम आदि में सपोर्ट भी लगवाकर रखें।


नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: caasindia.in में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को caasindia.in के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। caasindia.in लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी/विषय के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

 

caasindia.in सामुदायिक स्वास्थ्य को समर्पित हेल्थ न्यूज की वेबसाइट

Read : Latest Health News|Breaking News|Autoimmune Disease News|Latest Research | on https://www.caasindia.in|caas india is a multilingual website. You can read news in your preferred language. Change of language is available at Main Menu Bar (At top of website).
Join Whatsapp Channel Join Now
Join Telegram Group Join Now
Follow Google News Join Now
Caas India - Ankylosing Spondylitis News in Hindi
Caas India - Ankylosing Spondylitis News in Hindihttps://caasindia.in
Welcome to caasindia.in, your go-to destination for the latest ankylosing spondylitis news in hindi, other health news, articles, health tips, lifestyle tips and lateset research in the health sector.
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Article